Saturday, July 22, 2017

बदलाव के बाद भी बदहाल है नारी ?

बदलाव के बाद भी बदहाल है नारी ?

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     अन्याय
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सबकुछ बदला पर सोच नही
सबकुछ पाया पर प्रेम नही

सबकुछ मांगा पर बेटी नही
सबकुछ दिया पर सम्मान नही

सबकुछ हारा पर अहंकार नही
सबकुछ जीता पर हृदय नही

सबकुछ जागा पर आत्म नही
सबकुछ प्यारा पर स्वप्न नही

सबकुछ छीना पर दर्द  नही
सबकुछ  मिला पर हमदर्द नही

सबकुछ समझा पर इंसान नही
सबकुछ मिटा पर अस्तित्व नही
सबकुछ छूटा पर रूढ़िवाद  नही
सबकुछ थमा पर अत्याचार नही

सबकुछ देखा पर सबूत नही
सबकुछ मेरा पर वजूद नही

सबकुछ सूखा पर आंसू नही
सबकुछ सहन पर अन्याय नही



बदहाल है नारी ?


हमें आजाद हुये 70वर्ष बीत गये पर आजादी के 70वर्ष बाद भी नही बदली तो नारी की बदहाली | देश के कुछ नेताओं की सेवाओं से हर वर्ष तालाब खुदे और सूखे पर नही सूखा तो नारी का आंसू | देश में मेक इन इंडिया की शुरूवात हुई पर वैल्यू इज वोमेन, रिस्पेक्ट इज वोमेन की शुरूवात नही हो सकी | कई तरह के सर्वे होते हैं हमारे भारत में पर आज तक यह सर्वे नही कि कितने लोग नारी का सम्मान करते | कितने लोग उसकी परेशानी में उसके साथ खड़े होते | समझ में तो यह नही आता जो काले मन का पापी व्यक्ति हमारी फूल सी बच्चियों के साथ खुले आम भयमुक्त होकर दुष्कर्म करके उन्हें जीते जी मार डालते हैं तो क्यों पुलिस उनको पकड़ने के बाद उनके चेहरे को काले कपड़े से उन्हें ढ़कने देती है ? जिनको शर्म के मायने नही मालूम जिन्होने बच्ची की आबरू तार-तार कर दी, उनको कपड़ा क्यों ? क्यों उनके चेहरे समाज को देखने नही देते ? क्यों उनको बीच चौराहे पर पूरे समाज के सामने जलील किया और पीटा नही जाता? क्यों जल्द फांसी नही दी जाती ? पूरा समाज इन आतताइयों को पिटता देखेगा तो इन जैसे लोग के मन में भय तो उत्पन्न होगा और जब तक बुराई को अच्छाई का भयंकर भय नही होगा तब तक कुकर्मियों के मंसूबे पूरे होते ही रहेगें | समाज के पापियों को समाज के सामने जब तक शर्मिंदा नहीं किया जायेगा और समाज के सामने जबतक इनपर लाठी नही बरसायी जायेगी तब तक इस टाइप की मानसिकता वाले लोग सुधरने वाले कतई नही हैं | हम आप अधिकारी व जनसेवक लोग प्रतिदिन अखबार में पढ़ते कि उस बेटी को ससुराल वालों ने दहेज में कार न मिलने पर  घर से निकाल दिया | लड़की घर आ जाती है | सभी को पता चल गया कि ससुराल लालचियों का अड्डा है, वह घर नही नर्क है पर फिर भी समाज के लोग उस बेटी को ही गलत ठहराते, उसे ही ताने देते | सारा ज्ञान पूरा धर्म उसी पर ही क्यों उडेला जाता | हमेशा घर की इज्जत की दुहाई बेटी को ही क्यों दी जाती है फिर चाहे वह इस इज्जत के फंदे में घुट कर उसकी जॉन ही क्यों न चली जाये | देखो तो हमारे नारी पूजनीय महान के संकीर्ण की कपटी गिरी हुई मनोदशा कि बेटी के मरने के दुख से ज्यादा घर की इज्जत की पड़ी है बेटी की मौत के दुख से ज्यादा उसके सुहागन होने की खुशी है | ससुरालीजन थाना अदालत के डर से नाटकीय ढंग से बेटी को लेने आ जाते कि अभी ले आते हैं मामला ठण्ड़ा हो जाये फिर इसका धीरे से काम लगा देगें | बेटी सबकुछ  भांप कर जाने से मना करती है कि उस घर नही जाना पर यह समाज का वही घिसा पिटा डायलॉग बेटी जाओ ससुराल ही तेरा घर है |मायके का रहना नर्क होवे है| बस उसे धकेल दिया गया उस अहंकारी लालची भट्टी में जहां बिन मौत मरना तय है | बस अगले महीने दिमागी बुखार से उस बेटी की मौत | इस बेटी को महानता का ठप्पा लग गया कि सुहागन गयी तुमरी बिटिया इह तो अच्छी मौत भयी | यह समाज हमेशा दर्द, आंसू और मौत को ही महानता का दर्जा देता | यही बेटी दर्द से भाग कर किसी और से शादी करके खुश रहती जिन्दा रहती तो यही समाज उसे कुलक्षणी और कुल्टा व चरित्रहीन कह-कह कर शब्दरूपी खंजरों से हर पल गोदता रहता कि जब तक वह हताश होकर आत्मघात न कर लेती| हम पूछना चाहते हैं समाज के उन ठेकेदारों से क्यों क्या नारी आंसु बहाने के लिये ही जन्मती है ? क्या बेटी को जीने का खुश रहने का हक नही | बेटा प्रेम विवाह कर सकता है पर बेटी नही ? क्यों बेटी क्या इंसान नही? उसके सपने नही ? हमेशा बेटियों को ही टोका जाता कि बालों में फूल न लगाओं, फैशन न करो, स्लीवलैश कपड़े न पहनों , टाइट जींश न पहनों , कुवारी हो लिपस्टिक मत लगाओ | हद हो गयी कुवारे पर फैशन न करो और शादी के बाद बच्चा सम्भालों मतलब बेटियों की छोटी सी भी खुशी और छोटी सी भी आजादी समाज को हजम नही होती | दुख से कहना पड़ता है कि बेटी से हमेशा छीना गया पर उसे दिया कुछ न गया , ऊँची पहाड़ी पर नंग चल कर यह समाज मांतारानी को चुनरी चढा आया पर घर की बहू को एक साड़ी दिल से न दी जा सकी, मंदिरों में देवियों का पूजन- श्रंगार कर खुश कर आया पर घर की कन्या को जो से खिलखिलाता  देख डांटा गया कि लड़कियां इतनी जोर से नही हंसा करती , फूलों का श्रंगार नही किया करती|ये तो हद है कि जो लड़का बेटियों को   छेड़ता है जो उन्हें कुदृष्टि से घूरता है उसे पीटने के बजाय बेटी को पीटा जाता है  क्यों? उसकी पढाई बन्द करवा दी जाती क्यों ? उसे अपने ही घर में नजरबंद कर दिया जाता है क्यों ? फिर उसकी तुरन्त शादी करवा दी जाती है क्यों? हद तो तब हो जाती कि जब छेड़ने वाले यहां तक की दुष्कर्मी व्यक्ति से जबरन अपनी निर्दोष बेटी की शादी करवा दी जाती | बोलो जो इंसान आपकी बेटी को छेड़े उसकी जिंदगी बर्बाद करे उसको जेल में फैंकने के बजाय आप उसकी जेल में ताउम्र अपनी निर्दोष बेटी को धकेल देते हो | यह विकृत सोच आपको कौन देता है ? इस सोच के देने वाले समाज के कुछ मतिहीन क्रूर ठेकेदारों का भी सरकार को पुलिस को संज्ञान लेना चाहिये जिन्होने समाज को लकीर का फकीर बना रखा है और बेटों और बेटियों में खाई को खोद रखा है और जिन्होने हमारी बेटियों को जीते जी मार रखा है | हमारे देश में कन्या प्रथम पूज्य है |हमारे देश में साल में नवरात्रि दो बार आती और पूरे अट्ठारह दिन कन्यापूजन दिवस उत्सव के रूप में मनाया जाता और उसी देश में कन्याओं के साथ जघन्य अपराध दुष्कर्म हो रहा है| यह बेहद निनंदनीय है| समाज के प्रति व्यक्ति को बेहद सतर्क और संवेदनशील और जिम्मेदारी का परिचय देने की जरूरत है कि जिससे ऐसी घिनौनी मानसिकता के लोग बख्शे न जा सकें | इस दिशा में प्रत्येक व्यक्ति को अपना योग्यदान देना होगा जिससे ऐसी निनंदनीय घटनाओं पर हमेशा के लिये विराम लग सके और आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ्य समाज में खुली हवा में श्वांस ले सकें और निडरता से अपने सपनों को पंख दे सकें और ऊँची उड़ाने भर सकें | समाज की ईकाई हम और आप हैं हमें और आपको स्वस्थ्य सोच रखनी होगी तभी हम वह भारत देख पायेगें जो हम सोचते हैं | वैसे भी यह समाज बेटी को नारी को सिर्फ मौन मूर्ती पाषाण बनाकर पाषाण समझ कर पूजने में आनंदित है, बस |
हे ! समाज के लोगों कब तक पाषाड़ों को पूजोगे कभी तो जीवन को भी पूजिये | समाज के एक दहेज लोभी परिवार ने और लालची पति ने अपनी निर्दोष पत्नी की जान ले ली तो वह सुहागन गयी कोई गम नही| क्या पत्नी  के सामने पति गुजर जाये तो यही समाज पत्नि को बिधवा कहकर उसको शुभ कार्यों में बैठना वर्जित कर देते हैं पर क्या यही सब पुरूष को सहना पड़ता तो जवाब है नही | आज बीवी मरे कल पुरूष शादी कर ले समाज कुछ नही कहता बीवी मुस्कुरा कर  किसी से बोल भी दे तो समाज उंगली उठा देता | हमारे समाज में बहुत बदलाव आये लोग साफ -सुथरे फैशनेबल हो गये पर नही बदली तो नारी की दुर्दशा | आज जब वह नौकरी कर रही तो ससुराल केवल सैलरी को ही अपनी बहू मान बैठा है | उसे तो पढ़ी- लिखी मुफ्त में कामवाली और कामकाजी और कमाऊ दासी जो मिल गयी है | नौकरी वाली महिलायें तो और भी ज्यादा शोषण सह रही हैं | घर में सास दुखी कर रही स्कूल में सरकारी आदेश कि एक ही शिक्षक से सभी विषय पढ़वाये जा रहे और दबाव की गुणवत्ता नही | समाज में दुष्कर्म की घटनायें इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि ग्रामीण लोग अपनी नाबालिक बेटियों का विवाह कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं | बेटियों की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं जिनमें बेटियों को दबाकर घर में रखने पर उनका शारीरिक व मानसिक विकास रूक गया है और उनमें कुपोषण व कम उम्र में माँ बनने पर उनकी जॉन पर खतरा मंडरा रहा है | सरकार को बेटियों की महिलाओं की बदहाली पर गम्भीरता से ध्यान देना होगा | नही तो एक दिन समाज की इस असमानता से मजबूर बेटियों की प्रश्नपूछती आंखों और सुलगते आँसुओं में पूरी मानवता शर्म से डूब जायेगी और जब दसों दिशायें, यह धरती ,प्रकृति और नियति भी इस असंतुलन को जब बर्दास्त नही कर सकेंगी तो हम सभी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी | तब, प्रकृति का कोप भूकम्प और सुनामी सा कहर बन हम सभी पर टूटेगा क्योंकि प्रकृति को किसी भी तरह का असुंतलन बिल्कुल बर्दास्त नही |



स्वलिखित रचना
आकांक्षा सक्सेना
ब्लॉगर 'समाज और हम'

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